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अहङ्कार

Ahankara

अहङ्कार सांख्य-दर्शन का वह तत्त्व है जो महत्तत्त्व से उत्पन्न होता है और जिससे आगे की समस्त सृष्टि निकलती है; इसका स्वरूप 'मैं' और 'मेरा' का अभिमान है, जिसके द्वारा निर्गुण आत्मा अपने को कर्ता और भोक्ता मानने लगता है। भा. २.५.२३–२४ में इसे तमःप्रधान बताकर तीन भेदों में विभक्त किया गया है — वैकारिक (सात्त्विक), तैजस (राजस) और तामस — जो क्रमशः द्रव्यशक्ति, क्रियाशक्ति और ज्ञानशक्ति हैं। इन्हीं तीनों से क्रमशः मन तथा दस देवता (भा. २.५.३०), दस इन्द्रियाँ (भा. २.५.३१) और पञ्च महाभूत (भा. २.५.२५–२९) उत्पन्न होते हैं, जिससे सम्पूर्ण सृष्टि-क्रम अहङ्कार पर केन्द्रित हो जाता है।

श्रीमद्भागवतमहापुराण 2.5.24 — संस्कृत विकिस्रोत (स्थिर oldid=200167)