तत्त्ववित् अद्वैत ज्ञान-तत्त्व को ब्रह्म, परमात्मा, भगवान् कहते हैं: 'ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते' (भा. १.२.११)।
ब्रह्म
Brahman
ब्रह्म — उपनिषद्-वेदान्त का परम तत्त्व है: सत्यं-ज्ञानमनन्तं ब्रह्म — वह एक निर्गुण चिदानन्द-सत्ता जिससे जगत् प्रवर्तता है और जिसका साक्षात्कार मोक्ष है; सगुण-निर्गुण दोनों दृष्टियों से निरूपित। संसाधित पदों में भागवत का निर्णय है: तत्त्ववित् जिस अद्वैत ज्ञान-तत्त्व को कहते हैं वही ब्रह्म, परमात्मा और भगवान् — तीन नामों से व्यक्त होता है: 'ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते' (भा. १.२.११); सत्त्व को 'ब्रह्मदर्शन' कहा गया (१.२.२४)।
श्रीमद्भागवतमहापुराण 1.2.11 — संस्कृत विकिस्रोत (स्थिर oldid=110173)
'यत्रैमे सदसद्रूपे प्रतिषिद्धे स्वसंविदा अविद्ययाऽऽत्मनि कृते इति तद्ब्रह्मदर्शनम्' (भा. १.३.३३)।
'विशुद्धं केवलं ज्ञानं प्रत्यक्सम्यगवस्थितम् । सत्यं पूर्णमनाद्यन्तं निर्गुणं नित्यमद्वयम्' (भा. २.६.३९); प्रशान्त मुनि इसे जानते हैं, असत् तर्कों से यह तिरोहित होता है (भा. २.६.४०)।
तत्त्ववित् एक अद्वैत तत्त्व कहते हैं जो 'ब्रह्म' और 'परमात्मा' दोनों नामों से व्यक्त होता है: 'ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते' (भा. १.२.११)। प्रमाण: प्रत्यक्ष ('अद्वयम्')।
वही अद्वैत तत्त्व 'भगवान्' नाम से भी व्यक्त होता है (भा. १.२.११) — वे भगवान् जो सात्वतां पतिः कृष्ण हैं (भा. १.१.१२)। एक तत्त्व, तीन नाम, जिनमें भगवान् सर्वाधिक पूर्ण है। प्रमाण: अद्वैत-तत्त्व हेतु प्रत्यक्ष; सूक्ष्मता विवरण में सुरक्षित।