'केचित्स्वदेहान्तर्हृदयावकाशे प्रादेशमात्रं पुरुषं वसन्तम् । चतुर्भुजं कञ्जरथाङ्गशङ्खगदाधरम्' (भा. २.२.८); चरणों से मुस्कान तक एक-एक अङ्ग, जीता हुआ स्थान छोड़ते हुए (भा. २.२.१३)।
धारणा
Dharana
धारणा योग के अष्टाङ्गों में छठा अङ्ग है — चित्त को एक देश में बाँधना, जो प्रत्याहार के पश्चात् और ध्यान से पूर्व आता है। भागवत इसे केवल योग-प्रक्रिया न मानकर भक्ति का साधन बनाता है: भा. २.१.१९ में एक अवयव पर अविच्छिन्न चित्त से ध्यान का विधान है, भा. २.१.२१ में कहा गया कि इसी के धारण से 'भक्तिलक्षण योग' शीघ्र सिद्ध होता है, और भा. २.२.१३ में चरणों से मुस्कान तक अङ्ग-प्रत्यङ्ग पर क्रमशः धारणा का क्रम दिया गया है जिसमें जीता हुआ स्थान छोड़ते जाना है। भा. २.२.१ के अनुसार ब्रह्मा ने इसी धारणा से अपनी नष्ट स्मृति पुनः प्राप्त की थी।
श्रीमद्भागवतमहापुराण 2.1.19 — संस्कृत विकिस्रोत (स्थिर oldid=332515)