सौतेली माता के वचनों से बिंधकर बालक ध्रुव तप के लिए वन गए, और स्तुति करने पर प्रसन्न भगवान् ने उन्हें ध्रुव-पद दिया: 'तस्मा अदाद्ध्रुवगतिं गृणते प्रसन्नः' (भा. २.७.८)। दिशा: दाता → प्राप्तकर्ता (उल्टी दिशा में लिखित)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
ध्रुव
Dhruva
ध्रुव उत्तानपाद के पुत्र और स्वायम्भुव मनु के पौत्र हैं, जिनकी कथा भागवत के चतुर्थ स्कन्ध का प्रसिद्ध आख्यान है। पिता की गोद में बैठने पर सौतेली माता सुरुचि के कटु वचनों से आहत होकर वे पाँच वर्ष की अवस्था में ही वन चले गए और नारद के उपदेश से मधुवन में तप किया; भगवान् ने प्रकट होकर उन्हें ध्रुवलोक — वह अचल पद जिसके चारों ओर समस्त ज्योतिश्चक्र घूमता है — प्रदान किया। भा. २.७.८ इस कथा को एक श्लोक में समेटता है और विशेष रूप से यह लक्षित करता है कि वे 'बालोऽपि सन्' — बालक होते हुए भी — तप के लिए गए, तथा उनके पद के ऊपर और नीचे दिव्य मुनि स्तुति करते हैं।
श्रीमद्भागवतमहापुराण 2.7.8 — संस्कृत विकिस्रोत (स्थिर oldid=200170)