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जल

Jala

जल अथवा अप् पञ्च महाभूतों में चतुर्थ है, जिसका गुण रस है और जो पूर्व-अन्वय से रूप, स्पर्श और शब्द भी धारण करता है। वैदिक साहित्य में आपः को माता और औषध कहा गया है, और सृष्टि-सूक्तों में आदि-जल ही वह है जिस पर नारायण शयन करते हैं — भागवत में भी अण्ड सहस्रों वर्ष जल में ही शयन करता है (भा. २.५.३४)। भा. २.५.२८ में इसकी उत्पत्ति तेज के विकार से बताई गई है, जिससे भूतों का क्रम सूक्ष्म से स्थूल की ओर एक-एक गुण जोड़ता हुआ आगे बढ़ता है।

श्रीमद्भागवतमहापुराण 2.5.28 — संस्कृत विकिस्रोत (स्थिर oldid=200167)