जब विष-पान से गौएँ व्याकुल हो गयीं, कृष्ण ने भुजगाधिप को दबाकर और उठाकर, उन गौओं को उस जल को पिलाया जो अपनी स्वाभाविक स्थिति में लौट आया था: 'निगृह्य भुजगाधिपम् ... आपाययद्गावस्तत्तोयं प्रकृतिस्थितम्' (भा. ३.२.३१)। यहाँ 'भुजगाधिप' नाम से नहीं, विशेषण से आया है।
कालिय
Kaliya
कालिय वह विषैला नाग है जो रमणक द्वीप से गरुड़ के भय से भागकर यमुना के ह्रद में जा बसा, जिससे उसका जल विषाक्त हो गया और उसे पीने वाले पशु तथा ग्वाले मर गए। कृष्ण ने कदम्ब वृक्ष से कूदकर उस ह्रद में प्रवेश किया, उसके फणों पर नृत्य किया और उसे परास्त कर वहाँ से जाने का आदेश दिया; नाग-पत्नियों की स्तुति पर उन्होंने उसे अभय देकर समुद्र भेज दिया और यह वचन दिया कि उसके सिर पर श्रीचरण-चिह्न देखकर गरुड़ उसे नहीं सताएँगे। भा. २.७.२८ इसे जल की शुद्धि के प्रयोजन से जोड़ता है — 'तच्छुद्धये' — अर्थात् दण्ड का लक्ष्य विनाश नहीं, शोधन है।
श्रीमद्भागवतमहापुराण 2.7.28 — संस्कृत विकिस्रोत (स्थिर oldid=200170)