केवल इन्द्रियतृप्ति नहीं
'कामस्य नेन्द्रियप्रीतिर्लाभो जीवेत यावता' (भा. १.२.१०)।
Kama
काम — पुरुषार्थ-चतुष्टय का तृतीय सदस्य है: इच्छा और विधिवत् भोग; वैदिक देवता-कामदेव के रूप में भी विख्यात। संसाधित पदों में इसका मर्यादित स्वरूप बताया गया: काम का तात्पर्य केवल इन्द्रिय-तृप्ति नहीं — 'कामस्य नेन्द्रियप्रीतिः' — भोग जीवन-धारण हेतु ही है, अनन्त नहीं (भा. १.२.१०)।
श्रीमद्भागवतमहापुराण 1.2.9 — संस्कृत विकिस्रोत (स्थिर oldid=110173)
'कामस्य नेन्द्रियप्रीतिर्लाभो जीवेत यावता' (भा. १.२.१०)।