भा. ३.७.२५ में विदुर मनुओं को 'मन्वन्तराधिप' कहते हैं: 'सर्गांश्चैवानुसर्गांश्च मनून्मन्वन्तराधिपान्'। इससे मन्वन्तर उस काल का नाम है जिस पर एक मनु का अधिपत्य होता है, और इसलिये मनु से पृथक् सत्ता के रूप में घोषित किया गया है।
मन्वन्तर
Manvantara
मन्वन्तर — काल-विभाग, जिस पर एक मनु का अधिपत्य होता है। भा. ३.७.२५ में विदुर मैत्रेय से पूछते हैं कि प्रजापतियों के पति ने 'सर्गांश्चैवानुसर्गांश्च मनून्मन्वन्तराधिपान्' — सर्ग, अनुसर्ग, तथा मन्वन्तराधिप मनुओं — की कल्पना कैसे की। 'मन्वन्तराधिप' शब्द से स्पष्ट है कि मन्वन्तर वह काल है जिस पर एक मनु अधिपति होता है; अतः इसे मनुओं से पृथक् सत्ता के रूप में रखा गया है।
श्रीमद्भागवतमहापुराण 3.7.25 — संस्कृत विकिस्रोत (स्थिर अध्याय-पृष्ठ; देवनागरी पाठ सत्यापित प्रतिलिपि से — validation/sanskrit_skandha3.json)
भा. ३.११.२३ में भगवान् के दिन में चौदह मनुओं का भोग बताया गया है। भा. ३.११.२४ में कहा गया है कि प्रत्येक मनु अपना काल भोगते हैं, सत्तर से अधिक, और मन्वन्तरों में मनु, उनके वंश के ऋषि, देवता और अनुचर सुरेश युगपत् होते हैं। भा. ३.११.२६ में भगवान् अपनी मूर्तियों से सत्त्व धारण कर मनु आदि के द्वारा विश्व का पालन करते हैं।