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पाण्डव

Pandavas

इनके कुल का वर्धक परीक्षित था

'पाण्डूनां मानवर्धनः' (भा. १.४.१०)।

दर्शन, स्पर्श, संलाप, शयन, आसन और भोजन — कृष्ण के साथ षड्विध सान्निध्य

'दर्शनस्पर्शसंलापशयनासनभोजनैः' (भा. १.१०.१२) — इसी से विरह असह्य हुआ।