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पितर

Pitris

पितर पूर्वजों की वह श्रेणी हैं जो मृत्यु के पश्चात् पितृलोक में निवास करते हैं और जिन्हें श्राद्ध, तर्पण तथा पिण्डदान द्वारा तृप्त किया जाता है; वैदिक धर्म में देव-ऋण, ऋषि-ऋण के साथ पितृ-ऋण तीन ऋणों में गिना जाता है, जिसका शोधन सन्तान-उत्पत्ति और श्राद्ध से होता है। भा. २.३.८ में 'तन्तुं तन्वन् पितॄन् यजेत्' — वंश-तन्तु के विस्तार की कामना वाले को पितरों का यजन करने का विधान है, जो इसी ऋण-सिद्धान्त का प्रतिफलन है।

श्रीमद्भागवतमहापुराण 2.3.8 — संस्कृत विकिस्रोत (स्थिर oldid=201379)