देव-सर्ग की अष्टविध जातियों में से एक
भा. ३.१०.२७ में राक्षसों का नाम यक्षों और चारणों के साथ आता है। भागवत उन्हें देव-सर्ग के भीतर ही रखता है, असुरों से पृथक्, जो उसी श्लोक में अलग गिने गये हैं।