मैत्रेय कहते हैं कि तृतीय स्वभाव से वे गण उत्पन्न हुए जो दोनों के मध्य के व्योम — नाभि — का आश्रय लेते हैं, और वे रुद्र के पार्षद हैं: 'तार्तीयेन स्वभावेन भगवन्नाभिमाश्रिताः । उभयोरन्तरं व्योम ये रुद्रपार्षदां गणाः' (भा. ३.६.२९)।
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रुद्रपार्षद
Rudra-parshadas
रुद्रपार्षद — समूह, रुद्र के अनुचर, जो नाभि के व्योम का आश्रय लेते हैं। भा. ३.६.२९ में मैत्रेय कहते हैं: 'तार्तीयेन स्वभावेन भगवन्नाभिमाश्रिताः । उभयोरन्तरं व्योम ये रुद्रपार्षदां गणाः'। भा. ३.६.२७-२८ में द्युलोक सत्त्व से और पृथ्वी रजः से प्राप्त हुई थी; ये गण तृतीय स्वभाव से, अर्थात तम के भाग से, दोनों के मध्य के आकाश में स्थित हैं। रुद्र स्वयं शिव का विशेषण है, अतः केवल इन अनुचरों को समूह के रूप में घोषित किया गया है।
श्रीमद्भागवतमहापुराण 3.6.29 — संस्कृत विकिस्रोत (स्थिर अध्याय-पृष्ठ; देवनागरी पाठ सत्यापित प्रतिलिपि से — validation/sanskrit_skandha3.json)
नाभि के व्योम का आश्रय; तृतीय स्वभाव से उत्पत्ति