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शिशुमार-चक्र

Shishumara-chakra

शिशुमार-चक्र आकाश में ग्रहों और नक्षत्रों का वह विन्यास है जिसे पुराण एक शिशुमार (डॉल्फिन अथवा घड़ियाल) के आकार में देखते हैं, जिसकी पूँछ के अग्रभाग पर ध्रुव स्थित हैं; भागवत के पञ्चम स्कन्ध में इसका विस्तृत वर्णन है और इसे भगवान् का ज्योतिर्मय विग्रह कहा गया है। भा. २.२.२४ में यह ऊर्ध्वगामी योगी के मार्ग का एक पड़ाव है: सुषुम्ना रूपी ब्रह्मपथ से चलकर, वैश्वानर को पार कर, कल्मष धुल जाने पर वह 'हरेरुदस्तात्' — हरि के ऊपर स्थित — इस चक्र को प्राप्त होता है, और वहाँ से विश्व-नाभि को भी लाँघकर महर्लोक जाता है (भा. २.२.२५)।

श्रीमद्भागवतमहापुराण 2.2.24 — संस्कृत विकिस्रोत (स्थिर oldid=200166)