एक पुरुष के स्थिति-सृष्टि-लय धारण में लय की संज्ञा 'हर' है: 'स्थित्यादये हरिविरिञ्चिहरेति संज्ञाः' (भा. १.२.२३)।
शिव
Shiva
अन्य नाम हरः · शूलपाणिः · गिरिशः · वामदेवः · रुद्र · नीललोहितः · भवः · मन्युः
शिव — हिन्दू त्रिमूर्ति के तृतीय महादेव हैं: संहार (लय) के अधिष्ठाता, कैलास-वासी महायोगी, जिनकी आराधना लिंग-रूप में सम्पूर्ण भारत में होती है; उमा-पार्वती इनकी शक्ति हैं। संसाधित पदों में (भा. १.२.२३) ये 'हर' नाम से आते हैं — हरि (स्थिति) और विरिञ्चि (सृष्टि) के साथ एक परम पुरुष द्वारा धारित लय-कार्य की संज्ञा। पाठ एक ही पुरुष के कार्यगत नाम बताता है — शिव का कृष्ण से व्यक्तिगत तादात्म्य नहीं; अतः यथावचन अंकित किया गया, कोई तादात्म्य-सम्बन्ध नहीं जोड़ा गया।
श्रीमद्भागवतमहापुराण 1.2.23 — संस्कृत विकिस्रोत (स्थिर oldid=110173)
शिव का ब्रह्मा के साथ सम्बन्ध: पुत्र। स्रोत प्रमाण (SB 3.12.7): भा. ३.१२.७ में प्रजापति ब्रह्मा की भृकुटियों के मध्य से उनका मन्यु कुमार नीललोहित उत्पन्न हुआ: 'भ्रुवोर्मध्यात्प्रजापतेः । सद्योऽजायत तन्मन्युः कुमारो नीललोहितः'।
Husband Uma देवताशिव का उमा के साथ सम्बन्ध: पति। स्रोत प्रमाण (SB 2.3.7): उमा शिव की पत्नी हैं; भा. २.३.७ में दाम्पत्य-सुख की कामना वाले को 'उमां सतीम्' का यजन करने का विधान है, और उसी श्लोक में विद्या के लिए 'गिरिशम्' अर्थात् शिव का — दोनों का युग्म रूप में उल्लेख। प्रमाण: प्रबल साक्ष्य। अतिरिक्त प्रमाण (SB 3.12.13): शिव का उमा के साथ सम्बन्ध: पति। स्रोत प्रमाण (SB 3.12.13): भा. ३.१२.१३ में ब्रह्मा रुद्र से कहते हैं कि उमा सहित एकादश रुद्राणियाँ तुम्हारी स्त्रियाँ हैं: 'धीर्वृत्तिरुशनोमा च ... रुद्राण्यो रुद्र ते स्त्रियः'।
भा. ३.१२.१२। इनमें मनु और काल रुद्र के नाम हैं, स्वतन्त्र मनु या काल तत्त्व नहीं।
भा. ३.१२.१३ में इन्हें स्पष्ट रूप से रुद्र की स्त्रियाँ कहा गया है।
भा. ३.१२.११ में ब्रह्मा इन्हें पहले से बना हुआ बताते हैं।
शिव कृष्ण के गुह्यतम प्रभाव के ज्ञाता हैं: 'अस्यानुभावं भगवान् वेद गुह्यतमं शिवः' (भा. १.९.१९)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
शिव ने युद्ध में विस्मित होकर अर्जुन को अपना अस्त्र (पाशुपत) दिया: 'भगवान् युधि शूलपाणिर्विस्मापितः सगिरिजोऽस्त्रमदान्निजं मे' (भा. १.१५.१२) — पार्वती सहित। दिशा: दाता → प्राप्तकर्ता। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
भा. ३.१२.७।
हर उन्हीं के वश में होकर संहार करते हैं: 'सृजामि तन्नियुक्तोऽहं हरो हरति तद्वशः । विश्वं पुरुषरूपेण परिपाति त्रिशक्तिधृक्' (भा. २.६.३१) — त्रिमूर्ति का कार्य-विभाजन कठोर अधीनता के साथ कथित। प्रमाण: प्रत्यक्ष।