भगवान् के चरणों से धर्म-सिद्धि के लिये शुश्रूषा उत्पन्न हुई, और उसमें शूद्र उत्पन्न हुआ, जिसकी वृत्ति से हरि तुष्ट होते हैं: 'पद्भ्यां भगवतो जज्ञे शुश्रूषा धर्मसिद्धये । तस्यां जातः पुरा शूद्रो यद्वृत्त्या तुष्यते हरिः' (भा. ३.६.३३)।
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शूद्र
Shudras
शूद्र — वर्ण, पुरुष के चरणों से उत्पन्न। भा. ३.६.३३ में: 'पद्भ्यां भगवतो जज्ञे शुश्रूषा धर्मसिद्धये । तस्यां जातः पुरा शूद्रो यद्वृत्त्या तुष्यते हरिः' — भगवान् के चरणों से धर्म-सिद्धि के लिये शुश्रूषा उत्पन्न हुई, और उसमें शूद्र उत्पन्न हुआ, जिसकी वृत्ति से हरि तुष्ट होते हैं। श्लोक शुश्रूषा को स्वयं धर्म-सिद्धि का साधन बताता है।
श्रीमद्भागवतमहापुराण 3.6.33 — संस्कृत विकिस्रोत (स्थिर अध्याय-पृष्ठ; देवनागरी पाठ सत्यापित प्रतिलिपि से — validation/sanskrit_skandha3.json)
चरणों से उत्पत्ति; शुश्रूषा द्वारा हरि की तुष्टि