'वेत्थ त्वं सौम्य तत्सर्वं तत्त्वतस्तदनुग्रहात्' — गुरु स्निग्ध शिष्य को गुह्य तक बताते हैं (भा. १.१.८)।
सूत
Suta
अन्य नाम रौमहर्षणिः · Suta Romaharshani (son of Romaharshana)
सूत — भागवत के बाह्य कथा-फ्रेम के वक्ता: व्यास के शिष्य रोमहर्षण के पुत्र, पुराण-इतिहासों के विशेषज्ञ कथावाचक। भा. १.४.२२ में स्वयं स्वीकार: 'इतिहासपुराणानां पिता मे रोमहर्षणः'; १.४.१३ में शौनक उन्हें 'वाचां विषये स्नातम्' (वाक्-विद्या में पारंगत) कहते हैं।
श्रीमद्भागवतमहापुराण 1.1.5 — संस्कृत विकिस्रोत (स्थिर oldid=110172)
सूत का शौनक के साथ सम्बन्ध: शिष्य। स्रोत प्रमाण (SB 1.3.45): सूत ने उसी सभा में रहकर उस भूरितेजस् ब्राह्मण-ऋषि (शौनक) की कृपा से भागवत अधीत किया: 'अहं चाध्यगमं तत्र निविष्टस्तदनुग्रहात्' (भा. १.३.४४-४५)। प्रमाण: प्रबल साक्ष्य।
पुत्र Romaharshana ऋषिसूत का रोमहर्षण के साथ सम्बन्ध: पुत्र। स्रोत प्रमाण (SB 1.2.1): रोमहर्षण सूत के पिता हैं — वंश-वाचक 'रौमहर्षणिः' (भा. १.२.१)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
धाता-नियुक्त होकर वे दुस्तर, सत्त्वहारी कलि को कर्णधार की भाँति पार कराते हैं: 'कर्णधार इवार्णवम्' (भा. १.१.२२)।
'अहं चाध्यगमं तत्र निविष्टस्तदनुग्रहात्... श्रावयिष्यामि यथाधीतं यथामतिः' (भा. १.३.४५)।
'अहो वयं जन्मभृतोऽद्य हास्म वृद्धानुवृत्त्यापि विलोमजाताः दौष्कुल्यमाधिं विधुनोति शीघ्रं महत्तमानामभिधानयोगः' (भा. १.१८.१८)।
सूत ने आचार्य-प्रोक्त पुराणों का अध्ययन किया है: 'त्वया खलु पुराणानि... अधीतानि' (भा. १.१.६)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
सूत ने पुराणों के साथ इतिहासों का भी अध्ययन किया है (भा. १.१.६)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
जो भी धर्मशास्त्र हैं सूत ने उनका अध्ययन किया है: 'धर्मशास्त्राणि यान्युत' (भा. १.१.६)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
सूत को धाता (सृष्टिकर्ता ब्रह्मा) द्वारा दुस्तर कलि-सागर पार कराने हेतु कर्णधार रूप में ऋषियों को दिखाया गया: 'त्वं नः संदर्शितो धात्रा... कर्णधार इवार्णवम्' (भा. १.१.२२)। धाता = ब्रह्मा (परम्परा-व्याख्या)। प्रमाण: प्रबल साक्ष्य।
प्रश्नों से प्रसन्न होकर उन्होंने पहले ऋषिवचनों का सम्मान किया, फिर नमस्कार कर उत्तर देना आरम्भ किया (भा. १.२.१, १.२.४)।
सूत ने उत्तर आरम्भ करते हुए नारायण को नमस्कार किया: 'नारायणं नमस्कृत्य' (भा. १.२.४)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
सूत ने 'नरोत्तम' नर को नमस्कार किया: 'नरं चैव नरोत्तमम्' (भा. १.२.४)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
सूत ने देवी सरस्वती को नमस्कार किया: 'देवीं सरस्वतीम्' (भा. १.२.४)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
जय-उच्चारण से पूर्व सूत ने व्यास को नमस्कार किया: 'देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्' (भा. १.२.४)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।