भा. ३.७.४१ में विदुर कहते हैं: 'सर्वे वेदाश्च यज्ञाश्च तपो दानानि चानघ । जीवाभयप्रदानस्य न कुर्वीरन् कलामपि' — समस्त वेद, यज्ञ, तप और दान, जीव को अभय प्रदान करने की कला की भी बराबरी नहीं करते। भा. ३.७.२० में अल्प तप वाले के लिये वैकुण्ठ-पथ में सेवा दुर्लभ बतायी गयी है।
तपस्या
Tapas
अन्य नाम Tapasya (austerity)
तप — अनुष्ठान, जिसका फल भागवत जीव को अभय देने के आगे नगण्य बताता है। भा. ३.७.४१ में विदुर कहते हैं: 'सर्वे वेदाश्च यज्ञाश्च तपो दानानि चानघ । जीवाभयप्रदानस्य न कुर्वीरन् कलामपि' — समस्त वेद, यज्ञ, तप और दान, जीव को अभय प्रदान करने की कला की भी बराबरी नहीं करते। भा. ३.७.२० में इसके विपरीत दिशा में कहा गया है कि अल्प तप वाले के लिये वैकुण्ठ-पथ में सेवा दुर्लभ है। दोनों वक्तव्य एक ही मापदण्ड रखते हैं: तप का मूल्य उस प्रयोजन से तौला जाता है जिसे वह सिद्ध करता है।
श्रीमद्भागवतमहापुराण 3.7.34 — संस्कृत विकिस्रोत (स्थिर अध्याय-पृष्ठ; देवनागरी पाठ सत्यापित प्रतिलिपि से — validation/sanskrit_skandha3.json)