विराट् के दोनों कर्ण विदीर्ण होने पर दिशाओं ने अपना स्थान प्रविष्ट किया, और अपनी अंश-श्रोत्र से शब्द की सिद्धि होती है: 'कर्णावस्य विनिर्भिन्नौ धिष्ण्यं स्वं विविशुर्दिशः' (भा. ३.६.१७)।
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दिशाएँ
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दिशाएँ — समूह, विराट्-पुरुष के कर्णों का अधिष्ठान। भा. ३.६.१७ में: 'कर्णावस्य विनिर्भिन्नौ धिष्ण्यं स्वं विविशुर्दिशः । श्रोत्रेणांशेन शब्दस्य सिद्धिं येन प्रपद्यते' — दोनों कर्ण विदीर्ण होने पर दिशाओं ने अपना स्थान प्रविष्ट किया, और श्रोत्र की अंश से शब्द की सिद्धि होती है। भागवत यहाँ किसी एक देवता को नहीं, दिशाओं को ही श्रवण की अधिष्ठात्री शक्ति मानता है।
श्रीमद्भागवतमहापुराण 3.6.17 — संस्कृत विकिस्रोत (स्थिर अध्याय-पृष्ठ; देवनागरी पाठ सत्यापित प्रतिलिपि से — validation/sanskrit_skandha3.json)
कर्ण का अधिष्ठान; शब्द की सिद्धि का कारण