विदुर उद्धव को 'वासुदेवानुचरं प्रशान्तं बृहस्पतेः प्राक्तनं प्रतीतम्' कहते हैं (भा. ३.१.२५), और श्लोक २४ उन्हें 'भागवतम्' कहता है।
उद्धव
Uddhava
अन्य नाम औपगवि · Aupagavi
उद्धव — वृष्णि-वंशी, कृष्ण के चचेरे भाई, मन्त्री और अन्तरंग सखा; बृहस्पति के शिष्य माने जाते हैं। भा. १.८.७ में वे शैनेय (सात्यकि) के साथ कृष्ण के हस्तिनापुर-प्रस्थान में सम्मिलित हैं। एकादश स्कन्ध का 'उद्धव-गीता' नामक विशाल उपदेश कृष्ण ने इन्हीं को दिया — भागवत का अन्तिम बड़ा ज्ञान-प्रकरण।
श्रीमद्भागवतमहापुराण 1.8.7 — संस्कृत विकिस्रोत (स्थिर oldid=196197)
अध्याय के अन्तिम श्लोक में उद्धव को 'तीर्थकीर्तेः' और 'सखे' कहकर सम्बोधित किया गया है: 'वार्तां सखे कीर्तय तीर्थकीर्तेः' (भा. ३.१.४५)।
उद्धव कृष्ण के साथ हस्तिनापुर से प्रस्थान करते हैं: 'शैनेयोद्धवसंयुतः' (भा. १.८.७)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
विदुर द्वारा कृष्ण-वार्ता पूछे जाने पर उद्धव उत्तर न दे सके और एक क्षण के लिये मौन हो गये; तीव्र भक्तियोग से कृष्ण-चरण-सुधा में निमग्न होकर उनके समस्त अंग पुलकित हुए और आँसू बहे (भा. ३.२.१-५)।
अपने प्रिय पति को खोजते उद्धव ने भगवान् को सरस्वती पर अकेले बैठे देखा — श्यामावदात, विरज, प्रशान्त-अरुण-लोचन, चतुर्भुज, पीत-कौशाम्बर, दक्षिण चरण-कमल को वाम ऊरु पर टिकाये, बाल-अश्वत्थ का आश्रय लिये (भा. ३.४.६-८)।
त्रिलोक-गुरु, शब्द-योनि भगवान् द्वारा सन्दिष्ट होकर उद्धव बदर्याश्रम को प्राप्त हुए और समाधि के द्वारा हरि की आराधना करने लगे: 'बदर्याश्रममासाद्य हरिमीजे समाधिना' (भा. ३.४.३२)।