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वैतरणी

Vaitarani

स्वकर्मजनित सन्ताप का स्थान, जिसमें पतित जन गिरते हैं

'पश्यञ्जनं पतितं वैतरण्यां स्वकर्मजान् परितापाञ्जुषाणम्' (भा. २.२.७) — यह देखकर भी जो असत् का चिन्तन करे वह पशु-तुल्य है।