'पश्यञ्जनं पतितं वैतरण्यां स्वकर्मजान् परितापाञ्जुषाणम्' (भा. २.२.७) — यह देखकर भी जो असत् का चिन्तन करे वह पशु-तुल्य है।
वैतरणी
Vaitarani
वैतरणी पुराणों में यमलोक के मार्ग में पड़ने वाली वह भयङ्कर नदी है जिसे पापी जीव को पार करना पड़ता है; वह रुधिर, पीब और तप्त पदार्थों से भरी वर्णित है, और गोदान करने वाले के लिए सुगम कही गई है। यह नाम एक वास्तविक नदी का भी है, किन्तु भागवत में यह नरक-मार्ग की प्रतीक-नदी है। भा. २.२.७ में शुकदेव इसका उल्लेख वैराग्य के हेतु से करते हैं — 'पश्यञ्जनं पतितं वैतरण्यां स्वकर्मजान् परितापाञ्जुषाणम्' — अर्थात् जो यह देखकर भी कि लोग अपने ही कर्मों से उत्पन्न सन्ताप भोग रहे हैं, फिर भी असत् विषयों का चिन्तन करता है, वह पशुओं से भिन्न नहीं।
श्रीमद्भागवतमहापुराण 2.2.7 — संस्कृत विकिस्रोत (स्थिर oldid=200166)