कंस के भय से वसुदेव द्वारा लाये गये कृष्ण बलराम के साथ नन्द के व्रज में ग्यारह वर्ष रहे, अपनी ज्योति छिपाये: 'एकादशसमास्तत्र गूढार्चिः सबलोऽवसत्' (भा. ३.२.२६)।
व्रज
Vraja
अन्य नाम व्रजभूमि · Vrajabhumi
व्रज — गोपों का चरागाह-क्षेत्र, जिसमें नन्द का व्रज ('नन्दव्रज') आता है; भागवत के दशम स्कन्ध की कथा का मुख्य स्थान। तीसरे स्कन्ध में उद्धव विदुर से कहते हैं कि कंस के भय से वसुदेव द्वारा लाये गये कृष्ण बलराम के साथ यहाँ ग्यारह वर्ष अपनी ज्योति छिपाये रहे (भा. ३.२.२६)। उद्धव इस निवास को अत्यन्त आश्चर्यजनक कहते हैं — अनन्त वीर्य वाले भगवान् का व्रज में निवास, मानो शत्रु के भय से (भा. ३.२.१६)। व्रज की स्त्रियाँ रास-लीला में उनके कटाक्षों को देखकर अपने कर्तव्य भूल गयीं (भा. ३.२.१४), व्रजवासी उनके कौमार-चेष्टा के दर्शक थे (भा. ३.२.२८), और इंद्र की वर्षा में यही व्रज गोत्र-तपत्र द्वारा रक्षित हुआ (भा. ३.२.३३)।
श्रीमद्भागवतमहापुराण 3.2.16 — संस्कृत विकिस्रोत (स्थिर अध्याय-पृष्ठ; देवनागरी पाठ सत्यापित प्रतिलिपि से — validation/sanskrit_skandha3.json)
इंद्र की वर्षा से गोत्र-तपत्र द्वारा रक्षित व्रज में ही शरत्कालीन चन्द्रमा की किरणों से धुली रजनी का सम्मान करते हुए कृष्ण कल-पद गाकर स्त्रियों के मण्डल में रमे (भा. ३.२.३३-३४)।