'वृष्णिषु प्राप्य जन्मनी रामकृष्णाविति' (भा. १.३.२३)।
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वृष्णि कुल
Vrishnis
राम-कृष्ण का जन्म-कुल
वारुणी-पान से स्वयं विनाश
अनुज्ञा पाकर वृष्णि और भोज वारुणी पीकर विभ्रंशित-ज्ञान हो गये और दुरुक्तियों से एक-दूसरे के मर्म स्पर्श करने लगे; मैरेय के दोष से विषम-चित्त हो, सूर्यास्त में उनका परस्पर मर्दन हुआ — 'वेणूनामिव मर्दनम्', जैसे बाँसों की आपसी रगड़ (भा. ३.४.१-२)।