भा. ३.९.४१ में भगवान् कहते हैं: 'पूर्तेन तपसा यज्ञैर्दानैर्योगसमाधिना । राद्धं निःश्रेयसं पुंसां मत्प्रीतिस्तत्त्वविन्मतम्' — पूर्त, तप, यज्ञ, दान और योग-समाधि से पुरुषों का निःश्रेयस सिद्ध होता है। भा. ३.९.११ में भगवान् 'भावयोगपरिभावितहृत्सरोज' में आसीन बताये गये हैं, और भा. ३.९.२०-२१ में योग-निद्रा का उल्लेख आता है।
योग
Yoga
अन्य नाम Yoga-samadhi
योग — अनुष्ठान, जिसे भागवत निःश्रेयस के साधनों में गिनता है। भा. ३.९.४१ में भगवान् कहते हैं: 'पूर्तेन तपसा यज्ञैर्दानैर्योगसमाधिना । राद्धं निःश्रेयसं पुंसां मत्प्रीतिस्तत्त्वविन्मतम्'। भा. ३.९.११ में भगवान् 'भावयोगपरिभावितहृत्सरोज' में आसीन बताये गये हैं — भाव-योग से परिभावित हृदय-कमल में। भा. ३.९.२०-२१ में योग-निद्रा का उल्लेख आता है, और भा. ३.९.२६ में ब्रह्मा 'तपोविद्यासमाधिभिः' स्तुति करते हैं। रोस्टर में 'योग-निद्रा' पहले से थी, किन्तु योग स्वयं नहीं।
श्रीमद्भागवतमहापुराण 3.9.41 — संस्कृत विकिस्रोत (स्थिर अध्याय-पृष्ठ; देवनागरी पाठ सत्यापित प्रतिलिपि से — validation/sanskrit_skandha3.json)