अक्षय तृतीया अक्षय फल देने वाला शुभ दिन है, जो नई शुरुआत, खरीदारी और दान के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है; "अक्षय" का अर्थ है जो कभी घटता नहीं।
क्यों मनाते हैं
अक्षय तृतीया अक्षय फल देने वाला शुभ दिन है, जो नई शुरुआत, खरीदारी और दान के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है; "अक्षय" का अर्थ है जो कभी घटता नहीं।
क्षेत्रीय परंपरा; अक्षय शुभता का विश्वास
कब
अक्षय तृतीया वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया को पड़ती है (अप्रैल-मई)।
कब से मनाया जाता है
यह दिन त्रेता युग के आरंभ का प्रतीक माना जाता है और प्राचीन काल से शुभ रहा है।
क्षेत्रीय परंपरा
कौन मनाता है
पूरे भारत के हिंदु, और जैन व बौद्ध भी इसे मनाते हैं।
उत्पत्ति
इसकी उत्पत्ति इस विश्वास से है कि इस दिन सूर्य और चंद्रमा अपनी सर्वाधिक शुभ स्थिति में होते हैं, जिससे यह अनंत शुभ है; यह सत्ययुग और त्रेता युग के आरंभ से जुड़ा है।
क्षेत्रीय परंपरा (त्रेता युग आरंभ)
पूजनीय देवता
अनंत समृद्धि के लिए भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी की पूजा होती है।
कैसे मनाएँ
पूजा करें, दान करें, सोना या नई वस्तुएँ खरीदें, और इस शुभ दिन पर नए कार्य आरंभ करें।
विधि व प्रसाद
पूजा, दान, सोना खरीदना, और शुभ कार्य का आरंभ।