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होलिका दहन

होली की पूर्व संध्या पर अग्नि — भक्त प्रह्लाद की भक्ति और राक्षसी होलिका के दहन का प्रतीक।

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होलिका दहन, होली की पूर्व संध्या की अग्नि, भक्ति की बुराई पर विजय का प्रतीक है, जो होलिका के दहन की स्मृति है।

त्योहार की कथाएँ

होलिका का दहन

सत्ययुग
राक्षसी होलिका, जो अग्नि में नहीं जलती थी, ने विष्णु भक्त अपने भतीजे प्रह्लाद को जलाने का प्रयास किया। दैवी सुरक्षा से प्रह्लाद बचे और होलिका जल गई। होलिका दहन इसी विजय का पुनरावर्तन है।
Vishnu Purana; Bhagavata Purana

क्यों मनाते हैं

होलिका दहन, होली की पूर्व संध्या की अग्नि, भक्ति की बुराई पर विजय का प्रतीक है, जो होलिका के दहन की स्मृति है।
विष्णु पुराण; भागवत पुराण

कब

होलिका दहन फाल्गुन पूर्णिमा की शाम, होली से एक रात पहले किया जाता है (फरवरी-मार्च)।

कब से मनाया जाता है

प्रह्लाद कथा सत्ययुग की है; होलिका दहन सदियों से किया जाता है।
पौराणिक परंपरा

कौन मनाता है

पूरे भारत के हिंदु इसे मनाते हैं।

उत्पत्ति

इसकी उत्पत्ति पुराणों की प्रह्लाद-होलिका कथा से है, जब राक्षसी होलिका जल गई और भक्त प्रह्लाद बच गए।
विष्णु पुराण; भागवत पुराण (सत्ययुग)

पूजनीय देवता

भगवान विष्णु (नरसिंह) और होलिका का दहन।

कैसे मनाएँ

शाम को अग्नि जलाएँ, उसकी परिक्रमा करें, अनाज व नारियल अर्पित करें, और अच्छाई की विजय की प्रार्थना करें।

विधि व प्रसाद

अग्नि, परिक्रमा, अन्न अर्पण, और होलिका का प्रतीक रूप से दहन।

मुख्य तथ्य

होलिका दहन के अगले दिन होली का त्योहार होता है।
Regional tradition