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अर्जुन

Arjuna

अन्य नाम कपिध्वजः · पार्थः · फाल्गुनः · जिष्णुः · धनंजयः · गुडाकेशः · किरीटमाली

कृष्ण का परम मित्र और अनन्य शरणागत

अर्जुन का सम्पूर्ण चरित भागवत में कृष्ण-शरण का उदाहरण है; युद्ध-सारथी के रूप में कृष्ण उनके रथ में रहे।

दोनों ब्रह्मास्त्रों का संहार करने में समर्थ

'मतं च वासुदेवस्य संजहारार्जुनो द्वयम्' (भा. १.७.३२) — अश्वत्थामा (भा. १.७.२०) के विपरीत अर्जुन अस्त्र लौटाना जानता था।

द्वारका से तेज-हीन और अश्रु-मुख लौटे

'तं पादयोर्निपतितमयथापूर्वमातुरम् अधोवदनमब्बिन्दून् सृजन्तं नयनाब्जयोः' (भा. १.१४.२३) — 'अयथापूर्वम्', पहले कभी ऐसा नहीं।

कृष्ण के प्रयाण के साथ अपना तेज भी खो दिया

'वञ्चितोऽहं महाराज हरिणा बन्धुरूपिणा येन मेऽपहृतं तेजो देवविस्मापनं महत्' (भा. १.१५.५); वही धनुष, वही रथ, किन्तु 'ईशरिक्त' होकर सब असत् हो गया (भा. १.१५.२१)।

भगवद्गीता का ज्ञान पुनः प्राप्त किया

'गीतं भगवता ज्ञानं यत्तत्सङ्ग्राममूर्धनि कालकर्मतमोरुद्धं पुनरध्यगमत् प्रभुः' (भा. १.१५.३०) — वासुदेव-चरण के अनुध्यान से बढ़ी भक्ति द्वारा (भा. १.१५.२९)।

एकछत्र पृथ्वी-शासन

विदुर के पर्यटन काल में अर्जुन अजित (कृष्ण) के प्रभाव से एकछत्र, एकचक्र पृथ्वी का शासन कर रहे थे: 'तावच्छशास क्षितिमेकचक्रा मेकातपत्रामजितेन पार्थः' (भा. ३.१.२०)।

अर्जुन — member of — पाण्डव

अर्जुन पाण्डवों में तीसरा है (परम्परा से स्पष्ट)। प्रमाण: प्रबल साक्ष्य।