अर्जुन का सम्पूर्ण चरित भागवत में कृष्ण-शरण का उदाहरण है; युद्ध-सारथी के रूप में कृष्ण उनके रथ में रहे।
अर्जुन
Arjuna
अन्य नाम कपिध्वजः · पार्थः · फाल्गुनः · जिष्णुः · धनंजयः · गुडाकेशः · किरीटमाली
अर्जुन — पाण्डु-कुन्ती का तीसरा पुत्र, कृष्ण का परम मित्र: महाभारत-युद्ध का नायक, भगवद्गीता का शिष्य; इन्द्र का पुत्र परम्परा में माने जाते हैं। गाण्डीव धनुष और कपि-ध्वज रथ इनके प्रतीक। भा. १.७ में अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र का सामना करके कृष्ण को पुकारा — 'भक्तानामभयङ्कर'; कृष्ण के निर्देश से अश्वत्थामा का मुण्डन-दण्ड दिया।
श्रीमद्भागवतमहापुराण 1.7.15 — संस्कृत विकिस्रोत (स्थिर oldid=110178)
अर्जुन का द्रोण के साथ सम्बन्ध: शिष्य। स्रोत प्रमाण (SB 1.7.44): अर्जुन ने द्रोण से धनुर्वेद सीखा: 'सरहस्यो धनुर्वेदः… भवता शिक्षितो यदनुग्रहात्' (भा. १.७.४४)। दिशा: शिष्य → गुरु। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
Husband Subhadra Humanअर्जुन का सुभद्रा के साथ सम्बन्ध: पति। स्रोत प्रमाण (SB 1.10.9): सुभद्रा अर्जुन की पत्नी है; भा. १.१०.९ में वे हस्तिनापुर की कुल-स्त्रियों में गिनी गई हैं और अभिमन्यु की माता हैं (भा. १.८.१४ का कुरु-वंश-सूत्र)। प्रमाण: प्रबल साक्ष्य।
Student Krishna देवताअर्जुन का श्रीकृष्ण के साथ सम्बन्ध: शिष्य। स्रोत प्रमाण (SB 1.9.36): कृष्ण ने आत्म-विद्या से अर्जुन की दोष-बुद्धि दूर की: 'कुमतिमहरदात्मविद्यया' (भा. १.९.३६) — यह भगवद्गीता का ही निर्देश है। दिशा: गुरु → शिष्य। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
पिता Abhimanyu राजाअर्जुन का अभिमन्यु के साथ सम्बन्ध: पिता। स्रोत प्रमाण (SB 1.10.9): अभिमन्यु अर्जुन का पुत्र है; भा. १.७.१४ में द्रौपदी और पाण्डवों के पुत्रों का वध तथा भा. १.८.१४ में उत्तरा का गर्भ 'कुरुतन्तवे' रक्षित होना — दोनों मिलकर अभिमन्यु को अर्जुन-पुत्र और परीक्षित के पिता के रूप में स्थापित करते हैं। दिशा: पुत्र → पिता। प्रमाण: प्रबल साक्ष्य।
पुत्र Kunti Humanअर्जुन का कुन्ती के साथ सम्बन्ध: पुत्र। स्रोत प्रमाण (SB 1.9.13): अर्जुन कुन्ती का पुत्र है; भा. १.९.१३ में पृथा के बालक-पुत्रों में तथा भा. १.८.२३ में 'सहात्मजा' में सम्मिलित। दिशा: पुत्र → माता। प्रमाण: प्रबल साक्ष्य।
'मतं च वासुदेवस्य संजहारार्जुनो द्वयम्' (भा. १.७.३२) — अश्वत्थामा (भा. १.७.२०) के विपरीत अर्जुन अस्त्र लौटाना जानता था।
'तं पादयोर्निपतितमयथापूर्वमातुरम् अधोवदनमब्बिन्दून् सृजन्तं नयनाब्जयोः' (भा. १.१४.२३) — 'अयथापूर्वम्', पहले कभी ऐसा नहीं।
'वञ्चितोऽहं महाराज हरिणा बन्धुरूपिणा येन मेऽपहृतं तेजो देवविस्मापनं महत्' (भा. १.१५.५); वही धनुष, वही रथ, किन्तु 'ईशरिक्त' होकर सब असत् हो गया (भा. १.१५.२१)।
'गीतं भगवता ज्ञानं यत्तत्सङ्ग्राममूर्धनि कालकर्मतमोरुद्धं पुनरध्यगमत् प्रभुः' (भा. १.१५.३०) — वासुदेव-चरण के अनुध्यान से बढ़ी भक्ति द्वारा (भा. १.१५.२९)।
विदुर के पर्यटन काल में अर्जुन अजित (कृष्ण) के प्रभाव से एकछत्र, एकचक्र पृथ्वी का शासन कर रहे थे: 'तावच्छशास क्षितिमेकचक्रा मेकातपत्रामजितेन पार्थः' (भा. ३.१.२०)।
अर्जुन पाण्डवों में तीसरा है (परम्परा से स्पष्ट)। प्रमाण: प्रबल साक्ष्य।
अर्जुन ने स्वयंवर में धनुष चढ़ाकर मत्स्य-यन्त्र बेधकर द्रौपदी को प्राप्त किया: 'सज्जीकृतेन धनुषाधिगता च कृष्णा' (भा. १.१५.७) — और यह कृष्ण के आश्रय से हुआ। प्रमाण: प्रत्यक्ष।