'तान् समेतान् महाभागानुपलभ्य वसूत्तमः' (भा. १.९.९); परम्परा में वे शापवश मनुष्य-रूप में जन्मे अष्टम वसु माने जाते हैं।
भीष्म
Bhishma
अन्य नाम देवव्रतः · भरतपुङ्गवः · वसूत्तमः
भीष्म (देवव्रत, गाङ्गेय) — शान्तनु और गङ्गा के पुत्र, कुरु-वंश के पितामह; पिता के विवाह के लिए आजीवन ब्रह्मचर्य और राज्य-त्याग की भीषण प्रतिज्ञा से 'भीष्म' कहलाए, और इसी से इच्छा-मृत्यु का वरदान पाया। परम्परा में वे अष्टम वसु के अवतार माने जाते हैं — भा. १.९.९ में 'वसूत्तम' कहा गया है। महाभारत-युद्ध में कौरव-पक्ष के सेनापति रहे; अर्जुन के बाणों से बिंधकर शर-शय्या पर उत्तरायण की प्रतीक्षा करते रहे (भा. १.९.२९)। भा. १.९ में उन्होंने युधिष्ठिर को दान, राज, मोक्ष, स्त्री और भगवद्-धर्म का सम्पूर्ण उपदेश दिया, फिर 'भीष्म-स्तुति' (भा. १.९.३२–४२) कहकर निष्कल ब्रह्म में लीन हो गए। उनकी स्तुति की विशेषता यह है कि वे उसी कृष्ण का स्मरण करते हैं जिन्हें उन्होंने अपने ही बाणों से बींधा था।
श्रीमद्भागवतमहापुराण 1.9.1 — संस्कृत विकिस्रोत (स्थिर oldid=330834)
'स कालः प्रत्युपस्थितः यो योगिनश्छन्दमृत्योर्वाञ्छितस्तूत्तरायणः' (भा. १.९.२९) — शर-शय्या पर पड़े रहकर उन्होंने अनुकूल काल की प्रतीक्षा की।
'दानधर्मान् राजधर्मान् मोक्षधर्मान् विभागशः स्त्रीधर्मान् भगवद्धर्मान्' (भा. १.९.२७) — दान, राज, मोक्ष, स्त्री और भगवद्-धर्म, संक्षेप और विस्तार दोनों में।
'यन्मेऽसूंस्त्यजतः साक्षात् कृष्णो दर्शनमागतः' (भा. १.९.२२) — एकान्त-भक्तों पर अनुकम्पा का प्रमाण।
भीष्म निष्कल ब्रह्म में लीन हुए: 'सम्पद्यमानमाज्ञाय भीष्मं ब्रह्मणि निष्कले' (भा. १.९.४४)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
भीष्म के तीक्ष्ण बाणों से कृष्ण का शरीर भिदा: 'मम निशितशरैर्विभिद्यमानत्वचि' (भा. १.९.३४) तथा 'शितविशिखहतो विशीर्णदंशः क्षतजपरिप्लुतः' (भा. १.९.३८)। दिशा: प्रहारक → आहत। प्रमाण: प्रत्यक्ष (स्वयं भीष्म का कथन)।