जो धर्म विश्वक्सेन-कथाओं में रति नहीं जगाता वह शुद्ध श्रम है: 'नोत्पादयेद्यदि रतिं श्रम एव हि केवलम्' (भा. १.२.८)।
धर्म
Dharma
अन्य नाम सौरभेयः · वृषः
धर्म — भारतीय चिन्तन का मूल शब्द है: वह नियम-संहिता और ऋत-बोध जो व्यक्ति, समाज और ब्रह्माण्ड को धारण करता है; वर्णाश्रम-व्यवस्था, सदाचरण और परमार्थ — तीनों अर्थों में प्रयुक्त। संसाधित पदों में: उसका परम रूप अधोक्षज में निःस्वार्थ, अविच्छिन्न भक्ति बताया गया (भा. १.२.६); जो धर्म भगवत्-कथा में रति नहीं जगाता वह श्रममात्र है (१.२.८); उसका लक्ष्य अपवर्ग है, धन नहीं (१.२.९); और वह वासुदेव के लिए है (१.२.२९)। वर्णाश्रम-धर्म की सिद्धि हरि-तोष है (१.२.१३)। कृष्ण के गमन पर 'धर्म किस शरण गया' — यह ऋषियों का महाप्रश्न बना (१.१.२३)।
श्रीमद्भागवतमहापुराण 1.1.2 — संस्कृत विकिस्रोत (स्थिर oldid=110172)
'मत्तं प्रमत्तमुन्मत्तं सुप्तं बालं स्त्रियं जडम् । प्रपन्नं विरथं भीतं न रिपुं हन्ति धर्मवित्' (भा. १.७.३६)।
'धर्मः पदैकेन चरन्' (भा. १.१६.२०); 'पादैर्न्यूनं शोचसि मैकपादम्' (भा. १.१६.२२) — तप, शौच और दया के तीन पाद लुप्त।
'तपः शौचं दया सत्यमिति पादाः कृते कृताः' (भा. १.१७.२४); तीन पाद गर्व, आसक्ति और मद से भग्न हुए, अब केवल सत्य शेष है (भा. १.१७.२५)।
भा. ३.१२.२५। धर्म को 'concept' प्रकार दिया गया है, इसलिये पुत्र-सम्बन्ध के बजाय यह तथ्य यहाँ दर्ज है।
धर्म वह है जिसका लक्ष्य अपवर्ग (मोक्ष) है: 'धर्मस्य ह्यापवर्ग्यस्य' (भा. १.२.९)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
धर्म वासुदेव के लिए है: 'वासुदेवपरो धर्मः' (भा. १.२.२९); इसी प्रकार यज्ञ, योग, क्रिया, तप और गति सब (भा. १.२.२८-२९)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।