'अहो बत स्वर्यशसस्तिरस्करी कुशस्थली पुण्ययशस्करी भुवः' (भा. १.१०.२७) — जहाँ की प्रजा नित्य भगवान् की स्मित-दृष्टि पाती है।
स्थान
द्वारका
Dvaraka
अन्य नाम कुशस्थली · द्वारवती
द्वारका — कृष्ण की राजधानी, समुद्र-तट पर बसाई गई सुदृढ़ नगरी, जहाँ जरासन्ध के बार-बार आक्रमणों के कारण उन्होंने मथुरा से यदुवंश को स्थानान्तरित किया। भा. १.८.८ में कृष्ण हस्तिनापुर से द्वारका जाने के लिए रथारूढ़ होते हैं, और उसी क्षण उत्तरा की पुकार उन्हें रोक लेती है। भा. १.११ में उनका द्वारका-प्रवेश विस्तार से वर्णित है।
श्रीमद्भागवतमहापुराण 1.8.8 — संस्कृत विकिस्रोत (स्थिर oldid=196197)
स्वर्ग के यश को तिरस्कृत करने वाली नगरी
मधु, भोज, दशार्ह, कुकुर, अन्धक और वृष्णि वंशों से रक्षित
'आत्मतुल्यबलैर्गुप्तां नागैर्भोगवतीमिव' (भा. १.११.१२) — भगवान् के ही समान बल वाले वंश, जैसे नागों से भोगवती।