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द्वारका

Dvaraka

अन्य नाम कुशस्थली · द्वारवती

स्वर्ग के यश को तिरस्कृत करने वाली नगरी

'अहो बत स्वर्यशसस्तिरस्करी कुशस्थली पुण्ययशस्करी भुवः' (भा. १.१०.२७) — जहाँ की प्रजा नित्य भगवान् की स्मित-दृष्टि पाती है।

मधु, भोज, दशार्ह, कुकुर, अन्धक और वृष्णि वंशों से रक्षित

'आत्मतुल्यबलैर्गुप्तां नागैर्भोगवतीमिव' (भा. १.११.१२) — भगवान् के ही समान बल वाले वंश, जैसे नागों से भोगवती।