'जीवस्य तत्त्वजिज्ञासा' (भा. १.२.१०)।
जीव
Jiva (the living being)
जीव — आत्मा का संसार-व्यवहारी रूप है: वह चैतन्य-द्रष्टा जो कर्मों के अनुसार जन्म-मरण के चक्र में भ्रमण करता है और जिसका स्वरूप-साक्षात्कार मोक्ष है; वेदान्त-परम्परा में जीव-ब्रह्म सम्बन्ध केन्द्रीय विषय है। संसाधित पदों में: जीव का सार्थक धर्म 'तत्त्वजिज्ञासा' है — 'जीवस्य तत्त्वजिज्ञासा' (भा. १.२.१०); और आत्मा में ईश्वर-दर्शन होने पर इसकी हृदय-ग्रन्थि भिद जाती है, संशय कटते और कर्म क्षीण होते हैं (१.२.२१)।
श्रीमद्भागवतमहापुराण 1.2.10 — संस्कृत विकिस्रोत (स्थिर oldid=110173)
भा. १.३.३२ गुण-व्यापार-रहित अव्यक्त परम को 'स जीवो यत्पुनर्भवः' कहता है; भाष्यकारों के मत भिन्न (जीव बनाम मूलाव्यक्त) — पाठ यथावत्।