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काल

Kala

यदु-संहार का साधन; अमोघ वाञ्छा

शुक कहते हैं कि ब्रह्म-शाप को केवल उपदेश (निमित्त) बनाकर, अमोघ-वाञ्छित काल के द्वारा भगवान् ने अपना कुल संहार किया: 'ब्रह्मशापापदेशेन कालेनामोघवाञ्छितः' (भा. ३.४.२९)। शाप निमित्त है, हेतु नहीं; कर्ता काल है।

माया में वीर्य-निधान का निमित्त

भा. ३.५.२६ में अधोक्षज 'कालवृत्त्या' — काल की वृत्ति से — गुणमयी माया में आत्मभूत पुरुष द्वारा अपना वीर्य निहित करते हैं। भा. ३.५.२७ में अव्यक्त से महत्तत्त्व भी 'कालचोदितात्' — काल से प्रेरित — उत्पन्न होता है।

परमाणु से द्विपरार्ध तक का विस्तार

भा. ३.११.३-४ में काल को सूक्ष्म और स्थूल दोनों में अनुमित बताया गया है, और उसके दो छोर बताये गये हैं — परमाणुता को भोगने वाला परमाणु-काल और सत् के अविशेष को भोगने वाला परम महान् काल। भा. ३.११.५-१२ में इकाइयों का क्रम दिया गया है: त्रुटि, वेध, लव, निमेष, क्षण, काष्ठा, लघु, नाडिका, मुहूर्त, प्रहर, याम, अहोरात्र, पक्ष, मास, ऋतु, अयन और वर्ष। भा. ३.११.३८ में 'कालोऽयं परमाण्वादिर्द्विपरार्धान्त ईश्वरः'।