शुक कहते हैं कि ब्रह्म-शाप को केवल उपदेश (निमित्त) बनाकर, अमोघ-वाञ्छित काल के द्वारा भगवान् ने अपना कुल संहार किया: 'ब्रह्मशापापदेशेन कालेनामोघवाञ्छितः' (भा. ३.४.२९)। शाप निमित्त है, हेतु नहीं; कर्ता काल है।
काल
Kala
काल — समय, जिसे भागवत यदुवंश के संहार का कर्ता बताता है। भा. ३.४.२९ में शुक कहते हैं: 'ब्रह्मशापापदेशेन कालेनामोघवाञ्छितः । संहृत्य स्वकुलं नूनं त्यक्ष्यन् देहमचिन्तयत्' — ब्रह्म-शाप को केवल उपदेश, अर्थात निमित्त, बनाकर, अमोघ-वाञ्छित काल के द्वारा भगवान् ने अपना कुल संहार किया। इस विभाजन का अर्थ महत्वपूर्ण है: शाप कारण नहीं है, निमित्त मात्र है; प्रभावी कर्ता काल है, जिसकी वाञ्छा कभी विफल नहीं होती। इसी काल की ओर भा. ३.३.१५ में इंगित किया गया था जब भगवान् ने कहा था कि मद से ताम्र-नेत्र यदु परस्पर विवाद करेंगे और 'मय्युद्यतेऽन्तर्दधते स्वयं स्म' — स्वयं ही अन्तर्हित हो जायेंगे।
श्रीमद्भागवतमहापुराण 3.4.29 — संस्कृत विकिस्रोत (स्थिर अध्याय-पृष्ठ; देवनागरी पाठ सत्यापित प्रतिलिपि से — validation/sanskrit_skandha3.json)
भा. ३.५.२६ में अधोक्षज 'कालवृत्त्या' — काल की वृत्ति से — गुणमयी माया में आत्मभूत पुरुष द्वारा अपना वीर्य निहित करते हैं। भा. ३.५.२७ में अव्यक्त से महत्तत्त्व भी 'कालचोदितात्' — काल से प्रेरित — उत्पन्न होता है।
भा. ३.११.३-४ में काल को सूक्ष्म और स्थूल दोनों में अनुमित बताया गया है, और उसके दो छोर बताये गये हैं — परमाणुता को भोगने वाला परमाणु-काल और सत् के अविशेष को भोगने वाला परम महान् काल। भा. ३.११.५-१२ में इकाइयों का क्रम दिया गया है: त्रुटि, वेध, लव, निमेष, क्षण, काष्ठा, लघु, नाडिका, मुहूर्त, प्रहर, याम, अहोरात्र, पक्ष, मास, ऋतु, अयन और वर्ष। भा. ३.११.३८ में 'कालोऽयं परमाण्वादिर्द्विपरार्धान्त ईश्वरः'।