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कलियुग
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कलियुग

Kali-yuga

अन्य नाम कलिः · Kali (the age)

अल्पायु, मन्द, दुर्मति, दुर्भाग्य, उपद्रुत जन

'प्रायेणाल्पायुषः... मन्दाः सुमन्दमतयो मन्दभाग्या ह्युपद्रुताः' (भा. १.१.१०)।

पुरुषों का सत्त्वहरण

'कलिं सत्त्वहरं पुंसाम्' (भा. १.१.२२)।

आगत कलि

'कलि आ गई' जानकर ऋषि दीर्घसत्र में बैठे: 'कलिमागतमाज्ञाय' (भा. १.१.२१)।

आगे का काल मनुष्यों के गुणों को क्षीण करने वाला

'इतोऽर्वाक्प्रायशः कालः पुंसां गुणविकर्षणः' (भा. १.१३.२८ — विदुर का धृतराष्ट्र से कथन)।

ऋतु-धर्म का विपर्यय और मनुष्यों में क्रोध, लोभ, असत्य

'कालस्य च गतिं रौद्रां विपर्यस्तर्तुधर्मिणः पापीयसीं नृणां वार्ताम्' (भा. १.१४.३); व्यवहार कुटिल, मित्रता में छल, और माता-पिता, भाई तथा दम्पतियों में कलह (भा. १.१४.४)।

भगवान् के प्रयाण के दिन से ही प्रवृत्त हुआ

'यदा मुकुन्दो भगवानिमां महीं जहौ स्वतन्वा… तदाहरेवाप्रतिबुद्धचेतसामधर्महेतुः कलिरन्ववर्तत' (भा. १.१५.३६) — यही भागवत की काल-गणना का मूल बिन्दु है।

असत्य से पुष्ट; सत्य-रूप अन्तिम पाद को भी हरना चाहता है

'तं जिघृक्षत्यधर्मोऽयमनृतेनैधितः कलिः' (भा. १.१७.२५)।

पाँच निवास — द्यूत, मद्य, स्त्री, हिंसा और स्वर्ण

'द्यूतं पानं स्त्रियः सूना यत्राधर्मश्चतुर्विधः' (भा. १.१७.३८); पुनः याचना पर स्वर्ण भी दिया गया, जिससे असत्य, मद, काम, रजस् और वैर उत्पन्न होते हैं (भा. १.१७.३९)।

राजाओं के शरीरों में बसकर लोभ, असत्य, चोरी और दम्भ लाता है

'लोभोऽनृतं चौर्यमनार्यमंहो ज्येष्ठा च माया कलहश्च दम्भः' (भा. १.१७.३२)।

प्रमत्तों में भेड़िये की भाँति; धीरों से भयभीत

'किं नु बालेषु शूरेण कलिना धीरभीरुणा अप्रमत्तः प्रमत्तेषु यो वृको नृषु वर्तते' (भा. १.१८.८); परीक्षित के शासन-काल में प्रविष्ट होकर भी प्रभावी न हो सका (भा. १.१८.५)।