'प्रायेणाल्पायुषः... मन्दाः सुमन्दमतयो मन्दभाग्या ह्युपद्रुताः' (भा. १.१.१०)।
कलियुग
Kali-yuga
अन्य नाम कलिः · Kali (the age)
कलियुग — हिन्दू युग-चक्र का चौथा और अन्तिम युग है (कृत, त्रेता, द्वापर के बाद), जिसमें धर्म का पाद-भाग मात्र रह जाता है और अधर्म बढ़ता है; परम्परा में इसका आरम्भ कृष्ण के स्वधाम-गमन के बाद माना गया है। संसाधित पदों में: इस युग के मनुष्य प्रायः अल्पायु, शिथिल, दुर्मति, दुर्भाग्य और सन्तप्त हैं (भा. १.१.१०); कलि 'आ चुकी है' (१.१.२१) और पुरुषों का सत्त्व हर लेती है (१.१.२२); ऋषियों ने हरि-कथा-रूपी दीर्घसत्र से उत्तर दिया। भगवत्-यश श्रवण इसका मल हरता है (१.१.१६)।
श्रीमद्भागवतमहापुराण 1.1.10 — संस्कृत विकिस्रोत (स्थिर oldid=110172)
'कलिं सत्त्वहरं पुंसाम्' (भा. १.१.२२)।
'कलि आ गई' जानकर ऋषि दीर्घसत्र में बैठे: 'कलिमागतमाज्ञाय' (भा. १.१.२१)।
'इतोऽर्वाक्प्रायशः कालः पुंसां गुणविकर्षणः' (भा. १.१३.२८ — विदुर का धृतराष्ट्र से कथन)।
'कालस्य च गतिं रौद्रां विपर्यस्तर्तुधर्मिणः पापीयसीं नृणां वार्ताम्' (भा. १.१४.३); व्यवहार कुटिल, मित्रता में छल, और माता-पिता, भाई तथा दम्पतियों में कलह (भा. १.१४.४)।
'यदा मुकुन्दो भगवानिमां महीं जहौ स्वतन्वा… तदाहरेवाप्रतिबुद्धचेतसामधर्महेतुः कलिरन्ववर्तत' (भा. १.१५.३६) — यही भागवत की काल-गणना का मूल बिन्दु है।
'तं जिघृक्षत्यधर्मोऽयमनृतेनैधितः कलिः' (भा. १.१७.२५)।
'द्यूतं पानं स्त्रियः सूना यत्राधर्मश्चतुर्विधः' (भा. १.१७.३८); पुनः याचना पर स्वर्ण भी दिया गया, जिससे असत्य, मद, काम, रजस् और वैर उत्पन्न होते हैं (भा. १.१७.३९)।
'लोभोऽनृतं चौर्यमनार्यमंहो ज्येष्ठा च माया कलहश्च दम्भः' (भा. १.१७.३२)।
'किं नु बालेषु शूरेण कलिना धीरभीरुणा अप्रमत्तः प्रमत्तेषु यो वृको नृषु वर्तते' (भा. १.१८.८); परीक्षित के शासन-काल में प्रविष्ट होकर भी प्रभावी न हो सका (भा. १.१८.५)।