पुरुष-रूप 'महदादिभिः' — महत् आदि तत्त्वों से निर्मित है (भा. १.३.१)।
महत्तत्त्व
Mahat-tattva
महत्-तत्त्व — सांख्य-वेदान्त की सृष्टि-योजना का प्रथम प्रकट तत्त्व: 'महान्' बुद्धि-तत्त्व, जिससे अहंकार और आगे का सम्पूर्ण भौतिक विकास होता है। संसाधित पदों में पुरुष-रूप 'महत् आदि तत्त्वों से' निर्मित कहा गया (भा. १.३.१) और माया महत् से आरम्भ कर भगवत्-रूप की रचना करती है (१.३.३०)।
श्रीमद्भागवतमहापुराण 1.3.1 — संस्कृत विकिस्रोत (स्थिर oldid=369178)
काल से प्रेरित अव्यक्त से महत्तत्त्व उत्पन्न हुआ, जो विज्ञानस्वरूप होकर आत्मदेह-स्थ विश्व को व्यक्त करता है और तम को दूर करता है: 'ततोऽभवन्महत्तत्त्वमव्यक्तात्कालचोदितात्' (भा. ३.५.२७)। तदनन्तर भगवद्-दृष्टि-गोचर होकर यह अपने को व्यक्त करता है (भा. ३.५.२८) और उससे अहंतत्त्व निकलता है (भा. ३.५.२९)।