अहंतत्त्व तीन प्रकार का है — वैकारिक, तैजस और तामस; विकार करते हुए अहंतत्त्व के वैकारिक भाग से मन उत्पन्न हुआ: 'अहन्तत्वाद्विकुर्वाणान्मनो वैकारिकादभूत्' (भा. ३.५.३०)। तैजस से ज्ञान-कर्ममय इन्द्रियाँ और तामस से भूतों का सूक्ष्म आदि उत्पन्न हुआ (भा. ३.५.३१)।
मन
Manas
अन्य नाम मनः
मनस् — सांख्य-क्रम में अहंकार के वैकारिक भेद से उत्पन्न तत्त्व। भा. ३.५.३० में मैत्रेय अहंतत्त्व को त्रिधा बताते हैं — वैकारिक, तैजस और तामस — और कहते हैं: 'अहन्तत्वाद्विकुर्वाणान्मनो वैकारिकादभूत्' — विकार करते हुए अहंतत्त्व के वैकारिक भाग से मन उत्पन्न हुआ। इसी श्लोक में वे देवताओं को भी वैकारिक बताते हैं, 'अर्थाभिव्यञ्जनं यतः', क्योंकि उन्हीं से अर्थों की अभिव्यक्ति होती है। भा. ३.५.३१ में आगे बताया गया है कि तैजस अहंकार से ज्ञान और कर्ममय इन्द्रियाँ निकलीं, तामस से भूतों का सूक्ष्म आदि, जिससे आकाश प्रकट हुआ। इस प्रकार मनस् इन्द्रियों और भूतों के बीच का केंद्रीय तत्त्व है।
श्रीमद्भागवतमहापुराण 3.5.30 — संस्कृत विकिस्रोत (स्थिर अध्याय-पृष्ठ; देवनागरी पाठ सत्यापित प्रतिलिपि से — validation/sanskrit_skandha3.json)