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सिद्धांत
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मोक्ष

Moksha

अन्य नाम अपवर्ग · Apavarga

धर्म का परम लक्ष्य (अपवर्ग)

धर्म 'आपवर्ग्य' है — जिसका परम सिद्धि-बिन्दु मोक्ष है (भा. १.२.९)।

जन्म का परम लाभ — अन्त में नारायण का स्मरण

'एतावान् साङ्ख्ययोगाभ्यां स्वधर्मपरिनिष्ठया जन्मलाभः परः पुंसामन्ते नारायणस्मृतिः' (भा. २.१.६)।

मूर्धा भेदकर देह-त्याग — षट् स्थानों से प्राण का आरोहण

नाभि → हृदय → वक्ष → तालु-मूल (भा. २.२.२०), फिर भ्रू-मध्य; सप्त-द्वार रोककर आधे मुहूर्त ठहरकर 'निर्भिद्य मूर्धन् विसृजेत्परं गतः' (भा. २.२.२१)।

स्त्री, शूद्र, हूण, शबर और तिर्यक् प्राणी भी देवमाया पार करते हैं

'ते वै विदन्त्यतितरन्ति च देवमायां स्त्रीशूद्रहूणशबरा अपि पापजीवाः… तिर्यग्जना अपि' (भा. २.७.४६) — शर्त केवल भगवत्-परायणों के शील और शिक्षा का ग्रहण है।

अन्यथा रूप को छोड़कर स्वरूप में स्थिति

'मुक्तिर्हित्वान्यथारूपं स्वरूपेण व्यवस्थितिः' (भा. २.१०.६) — भागवत की मुक्ति-परिभाषा, जो विनाश नहीं अपितु स्वरूप-प्रतिष्ठा है।