धर्म 'आपवर्ग्य' है — जिसका परम सिद्धि-बिन्दु मोक्ष है (भा. १.२.९)।
मोक्ष
Moksha
अन्य नाम अपवर्ग · Apavarga
मोक्ष (अपवर्ग) — पुरुषार्थ-चतुष्टय का चतुर्थ और परम तत्त्व है: संसार-बन्धन से नित्य मुक्ति, जो भारतीय दर्शनों में जीवन का अन्तिम लक्ष्य मानी गई। संसाधित पदों में: धर्म 'आपवर्ग्य' है — जिसका परम सिद्धि-बिन्दु मोक्ष है (भा. १.२.९); और मुमुक्षु भूतपतियों के घोर रूप छोड़कर नारायण की शान्त कलाओं की आराधना करते हैं (१.२.२६)।
श्रीमद्भागवतमहापुराण 1.2.9 — संस्कृत विकिस्रोत (स्थिर oldid=110173)
'एतावान् साङ्ख्ययोगाभ्यां स्वधर्मपरिनिष्ठया जन्मलाभः परः पुंसामन्ते नारायणस्मृतिः' (भा. २.१.६)।
नाभि → हृदय → वक्ष → तालु-मूल (भा. २.२.२०), फिर भ्रू-मध्य; सप्त-द्वार रोककर आधे मुहूर्त ठहरकर 'निर्भिद्य मूर्धन् विसृजेत्परं गतः' (भा. २.२.२१)।
'ते वै विदन्त्यतितरन्ति च देवमायां स्त्रीशूद्रहूणशबरा अपि पापजीवाः… तिर्यग्जना अपि' (भा. २.७.४६) — शर्त केवल भगवत्-परायणों के शील और शिक्षा का ग्रहण है।
'मुक्तिर्हित्वान्यथारूपं स्वरूपेण व्यवस्थितिः' (भा. २.१०.६) — भागवत की मुक्ति-परिभाषा, जो विनाश नहीं अपितु स्वरूप-प्रतिष्ठा है।