'जगृहे पौरुषं रूपं... संभूतं षोडशकलमादौ लोकसिसृक्षया' (भा. १.३.१)।
पुरुष अवतार
Purusha-avatara (the first cosmic Purusha)
अन्य नाम Adhipurusha · Hiranmaya-purusha · अधिपुरुष · हिरण्मयः पुरुषः · पौरुषं रूपम् · Paurusha-rupa (the purusha form)
पुरुष-अवतार — सृष्टि-आरम्भ में भगवान् का प्रथम ब्रह्माण्डीय रूप: महत् आदि तत्त्वों से निर्मित षोडश-कला पुरुष (भा. १.३.१), जो कारण-जल पर योगनिद्रा में शयन करता है और जिसकी नाभि-कमल से ब्रह्मा उत्पन्न होते हैं (१.३.२)। वेदान्त-परम्परा में यही कारण-विष्णु/महाविष्णु की संकल्पना से मेल खाता है (पाटलिपुटि में नाम-निर्णय नहीं — पाठ केवल 'पौरुषं रूपम्' कहता है)। लोक-विस्तर इन्हीं के अवयवों पर आधारित; ये समस्त अवतारों के अव्यय बीज-निधान हैं (१.३.३-५)। निराकार चिदात्मा का यह रूप माया-गुणों से महत् आदि द्वारा रचित है (१.३.३०)।
श्रीमद्भागवतमहापुराण 1.3.1 — संस्कृत विकिस्रोत (स्थिर oldid=369178)
'यस्याम्भसि शयानस्य' (भा. १.३.२)।
'यस्यावयवसंस्थानैः कल्पितो लोकविस्तरः... तद्वै भगवतो रूपं विशुद्धं सत्त्वमूर्जितम्' (भा. १.३.३)।
असीम — सहस्र पाद, ऊरु, भुज, आनन, मूर्ध, कर्ण, अक्षि, नासिका, मुकुट, अम्बर और कुण्डल से विराजमान (भा. १.३.४)।
'एतन्नानावताराणां निधानं बीजमव्ययम्' — देव-तिर्यक्-नरादि इन्हीं के अंशों से उत्पन्न (भा. १.३.५)।
'एतद्रूपं भगवतो ह्यरूपस्य चिदात्मनः मायागुणैर्विरचितं महदादिभिः' (भा. १.३.३०)।
वह अपने द्वारा अपने को एकधा, दशधा और त्रिधा विभाजित करता है (भा. ३.६.७); तदनन्तर त्रिधा का विवरण मिलता है: 'साध्यात्मः साधिदैवश्च साधिभूत इति त्रिधा । विराट् प्राणो दशविध एकधा हृदयेन च' (भा. ३.६.९)।
पुरुष-रूप महत् आदि तत्त्वों से निर्मित है: 'संभूतं... महदादिभिः' (भा. १.३.१)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
प्रथम पुरुष-रूप भगवान् का स्वीकृत रूप है: 'जगृहे पौरुषं रूपं भगवान्' (भा. १.३.१); भा. १.३.२८ ('एते चांशकलाः पुंसः') इस अध्याय के सब अवतार-सम्बन्धों का आधार है। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
पुरुष कारण-जल पर शयन कर योगनिद्रा वितन्वता है: 'योगनिद्रां वितन्वतः' (भा. १.३.२)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
विश्वसृजां पतिः ब्रह्मा पुरुष की नाभि-कमल से उत्पन्न हुए: 'नाभिह्रदाम्बुजादासीद् ब्रह्मा' (भा. १.३.२) — दिशा सत्यापित (पुरुष → ब्रह्मा)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
मैत्रेय का वर्णन: तेईस तत्त्वों के गण ने अपनी-अपनी मात्राओं से अधिपुरुष की उत्पत्ति की (भा. ३.६.४); वह हिरण्मय होकर जल में अण्डकोश में सहस्र परिवत्सर तक समस्त सत्त्वों से उपबृंहित रहा: 'हिरण्मयः स पुरुषः सहस्रपरिवत्सरान् । आण्डकोश उवासाप्सु सर्वसत्त्वोपबृंहितः' (भा. ३.६.६)। भा. ३.६.८ उसे 'आद्योऽवतारः' कहता है।