'रजस्तमोभावाः कामलोभादयश्च ये' (भा. १.२.१९)।
रजोगुण
Rajas-guna
अन्य नाम रजस् · Rajas
रजोगुण — प्रकृति का द्वितीय गुण है: उन्मेष, वेग, इच्छा और कर्मण्यता का स्वभाव — जो चित्त में काम-लोभ-क्रोधादि उत्पन्न करता है। संसाधित पदों में: इसमें काम, लोभ आदि विकार रहते हैं (भा. १.२.१९); यह तमस् से उत्पन्न माना गया — जैसे धूम से अग्नि (१.२.२४); भक्ति इसे धौत करती है (१.२.१९)।
श्रीमद्भागवतमहापुराण 1.2.19 — संस्कृत विकिस्रोत (स्थिर oldid=110173)
भा. ३.९.३५ में भगवान् रजस् को 'पापीयांस्' कहते हैं: 'ऋषिमाद्यं न बध्नाति पापीयांस्त्वां रजो गुणः । यन्मनो मयि निर्बद्धं प्रजाः संसृजतोऽपि ते'। बन्धन का आधार कर्म नहीं, मन का लगाव बताया गया है।
भा. ३.१०.२९ में स्रष्टा को 'रजःप्लुतः' — रजस् से प्लुत — कहा गया है, और फिर 'अमोघसङ्कल्प आत्मैवात्मानमात्मना' — अमोघ संकल्प वाले, आत्मा ही आत्मा को आत्मा से सृजित करते हैं। भा. ३.१०.१८ में भी मुख्य सर्ग भगवान् के रजोभाग की लीला बताया गया है।
तमस् से रजस् उत्पन्न होता है: 'तमसस्तु रजस्तस्मात्सत्त्वम्' (भा. १.२.२४) — जैसे पार्थिव से धूम, फिर अग्नि। प्रमाण: प्रत्यक्ष।