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सिद्धांत
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रजोगुण

Rajas-guna

अन्य नाम रजस् · Rajas

काम-लोभादि का वाहक

'रजस्तमोभावाः कामलोभादयश्च ये' (भा. १.२.१९)।

आद्य ऋषि को न बाँधने वाला, क्योंकि मन भगवान् में निबद्ध है

भा. ३.९.३५ में भगवान् रजस् को 'पापीयांस्' कहते हैं: 'ऋषिमाद्यं न बध्नाति पापीयांस्त्वां रजो गुणः । यन्मनो मयि निर्बद्धं प्रजाः संसृजतोऽपि ते'। बन्धन का आधार कर्म नहीं, मन का लगाव बताया गया है।

स्रष्टा का प्लावक गुण

भा. ३.१०.२९ में स्रष्टा को 'रजःप्लुतः' — रजस् से प्लुत — कहा गया है, और फिर 'अमोघसङ्कल्प आत्मैवात्मानमात्मना' — अमोघ संकल्प वाले, आत्मा ही आत्मा को आत्मा से सृजित करते हैं। भा. ३.१०.१८ में भी मुख्य सर्ग भगवान् के रजोभाग की लीला बताया गया है।

रजोगुण — arises from — तमोगुण

तमस् से रजस् उत्पन्न होता है: 'तमसस्तु रजस्तस्मात्सत्त्वम्' (भा. १.२.२४) — जैसे पार्थिव से धूम, फिर अग्नि। प्रमाण: प्रत्यक्ष।