सूत के सत्कार-प्रश्न से पूर्व उनकी प्रातःकालीन हुति-होम अग्नियाँ सम्पन्न थीं: 'प्रातर्हुतहुताग्नयः' (भा. १.१.५)।
नैमिषारण्य के ऋषिगण
Sages of Naimisharanya
अन्य नाम शौनकादयः · Rishis headed by Shaunaka
नैमिषारण्य के ऋषिगण — भागवत-कथा के श्रोता-प्रश्नकर्ता सामूहिक ऋषि-सभा — शौनक के नेतृ्व में हैं। संसाधित पदों में इन्होंने लोक-कल्याण हेतु सहस्र-वर्षीय सत्र आरम्भ किया (भा. १.१.४); प्रातःकालीन हवन समाप्त कर आसीन सूत का सत्कार कर श्रद्धापूर्वक प्रश्न किए (१.१.५); और उनका कृष्ण-विषयक प्रश्न लोक-मंगलकारी बताया गया (१.२.५)। यही सभा भागवत-श्रवण का आरम्भिक स्थान है।
श्रीमद्भागवतमहापुराण 1.1.4 — संस्कृत विकिस्रोत (स्थिर oldid=110172)
सूत ने उनके प्रश्न को लोक-मंगलकारी और आत्मा को प्रसन्न करने वाला कहा: 'यत्कृतः कृष्णसंप्रश्नो येनात्मा सुप्रसीदति' (भा. १.२.५)।
ऋषिगण शौनक के नेतृत्व वाले हैं: 'ऋषयः शौनकादयः' (भा. १.१.४)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
ऋषियों ने अनिमिषक्षेत्र नैमिष में स्वर्ग तथा लोकों के हित के लिए सहस्र-वर्षीय सत्र किया: 'सत्रं स्वर्गाय लोकाय सहस्रसममासत' (भा. १.१.४)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
ऋषियों ने प्रश्न से पूर्व आसीन सूत का यथोचित सत्कार किया: 'सत्कृतं सूतमासीनम्' (भा. १.१.५)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
प्रातःकालीन हवन पूर्ण कर ऋषियों ने श्रद्धापूर्वक सूत से पूछा: 'पप्रच्छुरिदमादरात्' (भा. १.१.५)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
ऋषियों का प्रश्न कृष्ण-विषयक था जिससे आत्मा परम संतुष्ट होती है: 'यत्कृतः कृष्णसंप्रश्नो येनात्मा सुप्रसीदति' (भा. १.२.५)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।