भा. ३.८.१० में भगवान् 'अहीन्द्रतल्पे' — अहीन्द्र के तल्प पर — शयन करते हैं। भा. ३.८.२३ में ब्रह्मा उन्हें 'मृणालगौरायतशेषभोगपर्यङ्क' पर शयान देखते हैं, जहाँ फणाएँ आतपत्र का काम करती हैं और मस्तक-रत्नों की द्युति युगान्त के जल का अन्धकार हटाती है।
शेष
Shesha
अन्य नाम दशशताननः
शेष अथवा अनन्त सहस्र फणों वाले वे नागराज हैं जिन पर क्षीरसागर में भगवान् विष्णु शयन करते हैं और जो समस्त लोकों को अपने फणों पर धारण किए हुए हैं; कल्पान्त में उनके मुखों से निकली अग्नि से संहार होता है, जिसका उल्लेख भा. २.२.२६ में भी है। बलराम को उनका अवतार माना जाता है। भा. २.७.४१ में उनका सर्वाधिक मार्मिक उल्लेख है: 'गायन् गुणान् दशशतानन आदिदेवः शेषोऽधुनापि समवस्यति नास्य पारम्' — सहस्र मुखों से अनादि काल से भगवान् के गुण गाते हुए भी वे आज तक उनका पार नहीं पा सके, जो भगवत्-महिमा की अनन्तता का सर्वोत्तम प्रमाण है।
श्रीमद्भागवतमहापुराण 2.7.41 — संस्कृत विकिस्रोत (स्थिर oldid=200170)
सहस्र मुख वाले आदिदेव शेष उनके गुणों को गाते हुए आज भी पार नहीं पा सके: 'गायन् गुणान् दशशतानन आदिदेवः शेषोऽधुनापि समवस्यति नास्य पारम्' (भा. २.७.४१)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।