शृङ्गी ने परीक्षित को शाप दिया कि सातवें दिन तक्षक उन्हें डँसेगा: 'इति लङ्घितमर्यादं तक्षकः सप्तमेऽहनि दङ्क्ष्यति स्म कुलाङ्गारम्' (भा. १.१८.३७) — कौशिकी-जल का स्पर्श कर छोड़ा गया 'वाग्वज्र'। यही भा. १.१२.२७ की भविष्यवाणी का निमित्त है। दिशा: शापदाता → शापित। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
शृङ्गी
Shringi
शृङ्गी — शमीक ऋषि के अत्यन्त तेजस्वी बालक पुत्र। भा. १.१८.३२–३७ में साथियों के साथ खेलते हुए उन्होंने सुना कि राजा ने उनके पिता का अपमान किया है; क्रोध से लाल आँखों वाले उस बालक ने कौशिकी नदी के जल का स्पर्श कर 'वाग्वज्र' छोड़ा — कि सातवें दिन तक्षक परीक्षित को डँसेगा। यह शाप ही भागवत के कथन का निमित्त बना, क्योंकि उन्हीं सात दिनों में शुकदेव ने परीक्षित को सम्पूर्ण भागवत सुनाया। पिता ने इस कृत्य का अनुमोदन नहीं किया और इसे अपरिपक्व बुद्धि का पाप कहा (भा. १.१८.४१, ४७); इस प्रकार शास्त्र स्वयं इस शाप को अनुचित ठहराता है।
श्रीमद्भागवतमहापुराण 1.18.32 — संस्कृत विकिस्रोत (स्थिर oldid=110189)