'स्वयं विप्रकृतो राज्ञा नैवाघं तदचिन्तयत्' (भा. १.१८.४९); 'अल्पीयसि द्रोह उरुर्दमो धृतः' (भा. १.१८.४१)।
शमीक
Shamika
अन्य नाम आङ्गिरसः
शमीक — आङ्गिरस-गोत्रीय ब्रह्मर्षि, शृङ्गी के पिता; समाधि-निष्ठ मुनि जिनकी इन्द्रियाँ, प्राण, मन और बुद्धि निरुद्ध थीं और जो 'स्थानत्रय से परे ब्रह्मभूत' अवस्था में स्थित थे (भा. १.१८.२६)। भा. १.१८ में मृगया से थके, भूखे-प्यासे परीक्षित ने उनसे जल माँगा; समाधि के कारण उत्तर न मिलने पर अपमानित अनुभव कर राजा ने उनके कन्धे पर मरा सर्प रख दिया। समाधि टूटने पर उन्होंने अपने अपमान को कुछ नहीं गिना, अपितु पुत्र के शाप पर सन्तप्त होकर उसे फटकारा — 'अत्यन्त अल्प अपराध पर तूने बहुत बड़ा दण्ड दे दिया' — और भगवान् से क्षमा की प्रार्थना की। भागवत में वे साधु-स्वभाव के आदर्श हैं: 'साधु द्वन्द्वों में न व्यथित होते हैं न हर्षित' (भा. १.१८.५०)।
श्रीमद्भागवतमहापुराण 1.18.25 — संस्कृत विकिस्रोत (स्थिर oldid=110189)
शमीक ने पुत्र का अभिनन्दन न कर उसे फटकारा: 'अहो बतांहो महदद्य ते कृतमल्पीयसि द्रोह उरुर्दमो धृतः' (भा. १.१८.४१) — अल्प अपराध पर अत्यधिक दण्ड। दिशा: फटकारने वाला → फटकारा गया। प्रमाण: प्रत्यक्ष।