भा. ३.९.३७ में भगवान् कहते हैं: 'तुभ्यं मद्विचिकित्सायामात्मा मे दर्शितोऽबहिः । नालेन सलिले मूलं पुष्करस्य विचिन्वतः' — आपकी विचिकित्सा के लिये मेरा आत्मा आपको दिखाया गया, जैसे जल में नाड़ी से कमल की जड़ खोजने वाले को। यह भा. ३.८.१९ की विफल अन्वेषणा का उत्तर है।
ब्रह्म-कमल
The Cosmic Lotus
अन्य नाम Loka-padma (the world-lotus)
पद्मकोश — वस्तु, भगवान् की नाभि से उद्भूत लोक-कमल, जिस पर ब्रह्मा प्रकट होते हैं। भा. ३.८.१३ में भगवान् के भीतर का अर्थ, रजस् से भी सूक्ष्मतर, कालानुगत गुण से विद्ध होकर नाभि-देश से भिन्न होता है; भा. ३.८.१४ में वह पद्मकोश सहसा उदित होकर 'अर्क इव' विशाल जल को प्रकाशित करता है। भा. ३.८.१५ में विष्णु उस लोक-पद्म में प्रवेश करते हैं और उसी में विधाता स्वयम्भू होते हैं। भा. ३.८.१६ में ब्रह्मा उसकी कर्णिका पर खड़े होकर चार मुख प्राप्त करते हैं; भा. ३.८.१८-१९ में वे उसकी जड़ खोजते हैं और नहीं पाते; भा. ३.८.३२ में समाधान पर वे उस नाभि-सरोवर और उसके सरोज को देखते हैं।
श्रीमद्भागवतमहापुराण 3.8.14 — संस्कृत विकिस्रोत (स्थिर अध्याय-पृष्ठ; देवनागरी पाठ सत्यापित प्रतिलिपि से — validation/sanskrit_skandha3.json)
भा. ३.८.१३ में भगवान् के भीतर का अर्थ, रजस् से भी सूक्ष्मतर, कालानुगत गुण से विद्ध होकर नाभि-देश से भिन्न होता है। भा. ३.८.१४ में वह पद्मकोश सहसा उदित होकर विशाल जल को अपने तेज से प्रकाशित करता है। भा. ३.८.१६ में ब्रह्मा उसकी कर्णिका पर खड़े होकर व्योम में परिक्रमण करते हैं और चार मुख प्राप्त करते हैं। भा. ३.८.१९ में वे नाभिकमल की जड़ खोजने के लिये नाड़ी से नीचे उतरते हैं और उसे नहीं पाते।