विराट् के दोनों नेत्र विदीर्ण होने पर लोकपाल त्वष्टा ने प्रवेश किया, और अपनी अंश-चक्षु से रूपों की प्राप्ति होती है: 'निर्भिन्ने अक्षिणी त्वष्टा लोकपालोऽविशद्विभोः । चक्षुषांशेन रूपाणां प्रतिपत्तिर्यतो भवेत्' (भा. ३.६.१५)।
देवता
त्वष्टा
Tvashtar
त्वष्टा — देवता, विराट्-पुरुष के नेत्रों के लोकपाल। भा. ३.६.१५ में मैत्रेय कहते हैं: 'निर्भिन्ने अक्षिणी त्वष्टा लोकपालोऽविशद्विभोः । चक्षुषांशेन रूपाणां प्रतिपत्तिर्यतो भवेत्' — विराट् के दोनों नेत्र विदीर्ण होने पर त्वष्टा ने उनमें प्रवेश किया, और उनकी अंश-चक्षु से ही रूपों की प्रतिपत्ति होती है। इस अध्याय की इन्द्रिय-क्रम में वे दृष्टि के अधिष्ठाता हैं। तीसरे स्कन्ध में उनका यही एक उल्लेख है।
श्रीमद्भागवतमहापुराण 3.6.15 — संस्कृत विकिस्रोत (स्थिर अध्याय-पृष्ठ; देवनागरी पाठ सत्यापित प्रतिलिपि से — validation/sanskrit_skandha3.json)
नेत्र के लोकपाल; रूपों की प्राप्ति का कारण