'प्रवर्तते यत्र रजस्तमस्तयोः सत्त्वं च मिश्रं न च कालविक्रमः । न यत्र माया किमुतापरे' (भा. २.९.१०); निवासी चतुर्भुज और श्री मूर्तिमती वहाँ विराजती हैं (भा. २.९.११, १३)।
वैकुण्ठ
Vaikuntha
वैकुण्ठ भगवान् विष्णु का नित्य धाम है, जो प्रकृति के त्रिगुणों से परे और सृष्टि-प्रलय से अस्पृष्ट माना जाता है; वहाँ के निवासी पार्षद चतुर्भुज रूप वाले होते हैं और वहाँ जरा, मृत्यु तथा शोक का प्रवेश नहीं। नाम का अर्थ ही 'जहाँ कुण्ठा अर्थात् अवरोध न हो' किया जाता है। भागवत के तृतीय स्कन्ध में जय-विजय के शाप के प्रसङ्ग में इसका विस्तृत वर्णन है। भा. २.७.३१ में इसका उल्लेख विशेष रूप से मार्मिक है: दिन भर के परिश्रम से रात्रि में सोए हुए साधारण ग्वालों को भगवान् इसी लोक तक पहुँचाएँगे — अर्थात् वह धाम तप या ज्ञान से नहीं, अपितु उनके सान्निध्य से सुलभ है।
श्रीमद्भागवतमहापुराण 2.7.31 — संस्कृत विकिस्रोत (स्थिर oldid=200170)